अस्सलाम अलैकुम श्रोता दोस्तों...
मैं आरजे बाबू... हॉरर वर्ल्ड ग्लोबल से।
आज की इस गहरी रात में... मैं आपको एक ऐसी जगह ले जाऊंगा, जहाँ पद्मा नदी का पानी सिर्फ लहरें ही नहीं उठाता... बल्कि पुकारता है। इंसानों को उनके नाम से पुकारता है। मांस और खून की प्यास में पुकारता है।
यह कहानी इब्राहिम मुर्शीद ने भेजी है... जो उन्होंने अपनी नानी से सुनी थी। साल लगभग 1945 का है। फरीदपुर के चरभद्रासन का कल्याणपुर चर। चारों तरफ काला पानी, घने काश के फूल, और अमावस्या का अंधेरा जैसे जीवित हो उठा हो।
उस समय कल्याणपुर चर में गरीबी की आग जल रही थी। मजीद मिया—उम्र करीब चालीस साल। आँखों में भूख का साया। उनकी पत्नी रहीमा, सात महीने की गर्भवती। शरीर इतना कमज़ोर कि चलने पर पैर कांपते थे। पेट में बच्चा था, लेकिन घर में खाने को कुछ नहीं। रात को रहीमा रो-रोकर कहती, "मजीद, मुझसे अब और नहीं सहा जाता... बस मेरा बच्चा न मरे।"
घर में सिर्फ रफीक था—मजीद का साला, उम्र सिर्फ पच्चीस साल। जीजा-साले का करीबी रिश्ता।
उस रात, अमावस्या थी। हवा रुकी हुई थी। घर में मिट्टी का दीया टिमटिमा रहा था। दोनों बैठकर फुसफुसाते हुए सलाह-मशविरा कर रहे थे।
रफीक ने कांपती हुई आवाज़ में कहा—
"जीजाजी... अब कोई और रास्ता नहीं है। रहीमा ने कुछ नहीं खाया तो बच्चा नहीं बचेगा। मैंने देखा है... उसकी आँखें धंसती जा रही हैं।"
मजीद काफी देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला—
"अमावस्या की रात है... आज डर के मारे कोई पद्मा में नहीं उतरेगा। आज अगर हम पद्मा में गए तो बहुत सारी मछलियां मिलेंगी। पद्मा की गहराई में बड़ी-बड़ी बोआल मछलियां होती हैं। चलो। जो भी हो, कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।"
रहीमा ने कमज़ोर हाथों से मजीद के कपड़े पकड़े और रोते हुए कहा—
"मत जाओ... अमावस्या में नदी ठीक नहीं है। आज... मैंने सपने में देखा है... एक काली परछाईं मेरा पीछा कर रही है।"
लेकिन भुखमरी के आगे कोई सपना नहीं टिकता। दोनों जाल लेकर निकल पड़े।
नदी के बीचों-बीच पहुँचते ही... सब कुछ थम गया। हवा मर चुकी थी। पानी की छलाप-छलाप की आवाज़ भी जैसे किसी ने दबा दी हो। चारों तरफ सिर्फ काश के फूलों की फुसफुसाहट।
रफीक का गला सूख गया। उसने फुसफुसाकर कहा—
"जीजाजी... कुछ अजीब लग रहा है। पानी के नीचे से कोई हमें देख रहा है। चलिए वापस चलते हैं।"
मजीद जाल फेंकते हुए मुस्कुराया—लेकिन वह मुस्कान भयानक थी।
"चुप रहो। अभी मछलियां आएंगी।"
अचानक जाल में ज़ोर का खिंचाव महसूस हुआ। नाव कांप उठी। दोनों मिलकर खींच रहे थे। पानी चीरकर एक विशाल बोआल मछली निकली—करीब तीन हाथ लंबी। लेकिन... यह कोई आम मछली नहीं थी।
उसकी दोनों आँखें इंसानों जैसी थीं। गोल, काली, एक पतली झिल्ली से ढकी हुई। और उन आँखों में... एक खौफनाक भाव था। जैसे कह रही हों— "मुझे खाओ।"
रफीक चीख पड़ा—
"जीजाजी! फेंक दीजिए इसे! यह मछली नहीं है... यह... कुछ और है!"
लेकिन मजीद की आँखें बदल चुकी थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उसने मछली को दोनों हाथों से पकड़ा... और उसे कच्चा ही चबाने लगा। उसकी दाढ़ी से खून टपकने लगा। वह मछली को फाड़-फाड़कर खा रहा था।
रफीक पागलों की तरह चिल्लाने लगा—
"अल्लाह के वास्ते! रुक जाइए!"
मजीद ने सिर उठाकर देखा। उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं। कोई सफेद हिस्सा नहीं था। उसने भीगी हुई भयानक आवाज़ में कहा—
"तू भी आ जा... वे इंतज़ार कर रहे हैं। क्या तुझे उनकी पुकार सुनाई नहीं दे रही?"
तभी नाव अचानक रुक गई। जैसे नीचे से सैकड़ों हाथों ने उसे पकड़ लिया हो। चारों तरफ से आवाज़ें गूंजने लगीं—अनगिनत, भीगी हुई, और भारी आवाज़ें:
"नीचे आ... पद्मा के नीचे आ... हमने तुम्हें खाना दिया है... अब तुम हमें अपना खाना दो..."
अचानक एक विशाल लहर उठी। रफीक पानी में गिर गया। वह जान बचाने के लिए हाथ-पैर मार रहा था। पीछे मुड़कर देखा—काले-काले हाथ, सिर्फ हाथ... मजीद के गले, सीने और पैरों को जकड़ कर नीचे खींच रहे थे।
मजीद ने आखिरी बार चीख कर कहा—
"रफीक... भाग! रहीमा को बचाना... उनकी पुकार... वे किसी को नहीं छोड़ते!"
फिर... पानी शांत हो गया। बस एक बुलबुला उठा।
फिर अचानक सन्नाटा छा गया।
रफीक घर लौट आया। लेकिन वह अब सामान्य नहीं था। इस घटना के बाद रहीमा अपना पति खोकर टूट गई और पागलों जैसी हो गई। रहीमा बताती थी कि रफीक रात को नींद में फुसफुसाता था—
"वे बुला रहे हैं... पानी के नीचे से... मुझे बुला रहे हैं..."
लेकिन रहीमा को कुछ समझ नहीं आता था। अगर वह रफीक से पूछती कि उस रात क्या हुआ था, तो रफीक कुछ नहीं बताता। बस इतना ही कहता, "वह हममें से किसी को ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।"
कुछ हफ्तों बाद, एक और अमावस्या की रात... रहीमा ने देखा कि रफीक घर में नहीं है। रहीमा को शक हुआ कि शायद वह नदी की तरफ गया है। यह सोचकर रहीमा घर के आस-पास के लोगों को लेकर तुरंत नदी की तरफ भागी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
सबने जाकर देखा कि रफीक नदी के बीचों-बीच चला गया है। यह देखकर कुछ लोग दो नावों में रफीक को पकड़ने के लिए निकले। लेकिन जैसे ही वे रफीक को पकड़ने लगे, रफीक ने खुद नदी में छलांग लगा दी। और तभी एक भयंकर तूफान आ गया, वे रफीक को पकड़ नहीं पाए।
लेकिन उनमें से एक लड़का, जिसका नाम नज़रुल था, उसने भी रफीक को बचाने के लिए छलांग लगा दी। लेकिन वह रफीक को पकड़ नहीं पाया, तभी कुछ काले हाथों ने रफीक को पानी के नीचे खींच लिया।
लेकिन तब भी लहरें शांत नहीं हुईं। नज़रुल को अचानक लगा कि उसके पैरों को कोई चीज़ नीचे खींच रही है। जब उसने ज़ोर से पैर छटपटाए, तो नाव वालों को समझ आ गया कि उसके साथ कुछ हो रहा है। तब जल्दी से उसे नाव पर खींच लिया गया। तभी हवा और भी तेज़ हो गई। इसके बाद वे धीरे-धीरे किनारे पर लौटे।
लेकिन किनारे पर खड़े लोगों को अभी भी नहीं पता था कि क्या हुआ है। बाद में उन्होंने सारी घटना सुनी। लेकिन अजीब बात यह थी कि वहाँ इतनी तेज़ हवा और तूफान था, लेकिन किनारे पर खड़े किसी भी इंसान ने कोई हवा या लहर महसूस ही नहीं की!
इस घटना के बाद नज़रुल को तेज़ बुखार आ गया, और बुखार में वह फुसफुसाकर कुछ कहने लगा— "हमने तुम्हें खाना दिया है... अब तुम हमें अपना खाना दो..."।
इसके बाद रहीमा की हालत भी और खराब होने लगी। कुछ दिनों बाद दोपहर में रहीमा नदी से पानी लाने गई। लेकिन वह घुटने भर पानी में उतरी और फिर ऊपर नहीं आई। उसका चेहरा भी सामान्य नहीं था, कैसा तो मौत की तरह पीला पड़ गया था।
और वह फुसफुसाकर कह रही थी, "वे मुझे भी ले जाएंगे।" और पता नहीं क्या-क्या बोला, जो समझ नहीं आया। इसके बाद उसके साथ गया शख्स डर के मारे उसे वहीं छोड़कर किनारे भाग आया और लोगों को इकट्ठा किया।
लेकिन तब वह डरावनी आवाज़ में कह रही थी, "हमने तुम्हें खाना दिया है... अब तुम हमें अपना खाना दो..."। इसके बाद वह बेहोश होकर गिर पड़ी। सबने उसे पकड़कर उठाया, लेकिन उसके बाद उसकी हालत भी बिगड़ती गई।
इधर नज़रुल भी अभी तक ठीक नहीं हुआ था। इससे गाँव वाले गहरी चिंता में पड़ गए कि अब किसकी बारी है।
तब गाँव वालों ने मिलकर फैसला किया कि वे किसी तांत्रिक (कविराज) के पास जाएंगे। लेकिन उस चर में कोई अच्छा तांत्रिक नहीं था। इधर नज़रुल और रहीमा की हालत और भी खराब हो रही थी। सबसे बड़ा डर यह था कि फिर से अमावस्या आने वाली थी। लेकिन क्या करें, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
तब गाँव के कुछ लोग मिलकर बगल के गाँव के कफीलुद्दीन तांत्रिक के पास गए। वह आया और रहीमा और नज़रुल को देखकर बहुत डर गया। उसने कहा, "यह मेरे बस की बात नहीं है।"
तब गाँव वाले और भी परेशान हो गए। सबने कफीलुद्दीन तांत्रिक से पूछा, "अब हम क्या कर सकते हैं?"
तब उसने कहा, "मैं एक इंसान को जानता हूँ, उसका गाँव सालेपुर चर है, उसका नाम मालेक तांत्रिक है।"
तब सब लोग मालेक तांत्रिक को ले आए। मालेक तांत्रिक नज़रुल को देखकर मन ही मन थोड़ा चौंक गए, लेकिन उन्होंने चेहरे पर यह ज़ाहिर नहीं होने दिया।
गंभीर आवाज़ में तांत्रिक ने कहा, "सुनो, यह काम आसान नहीं है। और यह काम मैं अकेले नहीं कर सकता। इस काम के लिए मुझे एक बहुत ही बहादुर इंसान की ज़रूरत होगी जो मौत से नहीं डरता हो।"
लेकिन कोई राज़ी नहीं हुआ। अचानक एक लड़के ने कहा, "मैं यह काम करूँगा।" उसकी उम्र 18 से 19 साल की होगी, अभी थोड़ा लंबा ही हो रहा था। उसने कहा, "मुझे बताइए क्या करना होगा।"
तब उस लड़के की माँ बोली, "तांत्रिक जी, कुछ मत सोचिएगा। मेरा बेटा नासमझी में बोल गया है, वह इतना बहादुर नहीं है।" उसने रो-रोकर अपने बेटे को बहुत मना किया।
लेकिन उसके बेटे का एक ही सीधा जवाब था, "जब इस दुनिया में जन्म लिया है, तो मौत भी एक दिन ज़रूर आनी है। दो जानें जा चुकी हैं, और दो मौत के मुहाने पर हैं, ऐसे में मैं हाथ पर हाथ धरे कैसे बैठ सकता हूँ? और वैसे भी, अगर इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो न जाने और कितनी जानें जाएंगी, इसका कोई ठिकाना नहीं।"
यह कहकर लड़के ने कहा, "तांत्रिक जी, मैं डरता नहीं हूँ। आप मुझे ज़िम्मेदारी सौंपिए।"
(कहानी के इस मोड़ पर मैं एक बात बता दूँ—आपमें से कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि यह माँ-बेटा कौन हैं? अचानक कहाँ से आ गए? यह मैं कहानी के अंत में बताऊंगा, सुनते रहिए।)
इसके बाद तांत्रिक ने उसे ज़िम्मेदारी दी। तांत्रिक ने कहा, "एक मिट्टी का मटका लेना होगा, वो भी बिना मोल-भाव किए, एक ही दाम में। मोल-भाव किया तो इसका असर खत्म हो जाएगा।"
तांत्रिक आग की लपटों की तरफ देखते हुए कहने लगे, "तुम्हें सात अलग-अलग गाँवों से सात सफेद शिमुल—यानी सफेद मंदार के पेड़ के छोटे पौधे उखाड़ने होंगे। लेकिन एक शर्त है! पौधों को जड़ समेत बिना किसी नुकसान के उखाड़ना होगा और हर पौधा उखाड़ते समय अपनी सांस रोककर रखनी होगी। एक ही सांस में एक पेड़ को ज़मीन से उखाड़ना है। अगर बीच में सांस छोड़ दी, तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी।"
तांत्रिक थोड़ा रुके और उसकी तरफ घूरते हुए आगे बोले, "सात गाँव घूमकर जब सात पौधे तुम्हारे हाथ में आ जाएं, तब ठीक अमावस्या की आधी रात को इस गाँव के दक्षिणी हिस्से के श्मशान के पास उस पुराने बरगद के पेड़ के नीचे आकर खड़े होना। याद रखना, लौटते वक्त पीछे से कोई भी पुकारे, तुम्हें मुड़कर नहीं देखना है। अगर डर कर एक बार भी पीछे मुड़े, तो तुम्हारी ज़िद और जान—दोनों ही खतरे में पड़ जाएंगे। कर पाओगे?"
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के सिर हिलाया और कहा, "मैं कर लूँगा। कल सूरज ढलने से पहले सात गाँवों के सात मंदार आपके सामने होंगे।"
इसके बाद तांत्रिक ने हिदायत दी, "आने वाली अमावस्या को आप लोग रहीमा और नज़रुल को अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देंगे और अमावस्या की रात उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने देंगे। सब लोग जागते रहेंगे और उन पर नज़र रखेंगे।"
इसके बाद सब लोग उन दोनों को एक ही जगह रखकर रात बिताने लगे। लेकिन वह रात सामान्य नहीं थी। नज़रुल और रहीमा फुसफुसाकर कुछ बोलते ही रहे। अचानक रात के करीब 2 बजे बहुत तेज़ आँधी-तूफान और बारिश शुरू हो गई।
उधर मालेक तांत्रिक ध्यान में बैठे थे, उन्होंने उस बहादुर लड़के को बिल्कुल अकेला नहीं छोड़ा था। उन्होंने ध्यान में देखा कि वह लड़का बहुत बड़े खतरे में है। तब उन्होंने 2 ताकतवर जिन्न भेजे। लेकिन उस लड़के को इस बारे में कुछ नहीं पता था।
जब वह छठा गाँव पार करके सातवें गाँव पहुँचा, तो उसका शरीर और साथ नहीं दे रहा था। लगातार छह गाँवों से एक ही सांस में मंदार का पेड़ उखाड़ने के कारण उसके फेफड़े फटने वाले हो गए थे। शरीर पसीने से भीग चुका था, और दोनों आँखें गुड़हल के फूल की तरह लाल हो गई थीं।
सातवें गाँव के श्मशान से सटे उस खास मंदार के पेड़ के सामने जाकर जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, ठीक तभी एक काली परछाईं उसके सामने आकर खड़ी हो गई। एक भयानक अट्टहास से चारों तरफ की ज़मीन कांप उठी, मानो हवा भी रुक गई हो। उसने सांस रोककर जैसे ही पेड़ को पकड़ने की कोशिश की, एक अदृश्य शक्ति ने उसे ज़ोरदार धक्का देकर दूर फेंक दिया।
उसका ज़िद्दी मन हार मानने को तैयार नहीं था, लेकिन शरीर अब और साथ नहीं दे रहा था। जब वह लगभग बेहोश होने की कगार पर था और उसकी मुट्ठी से पहले जमा किए गए पेड़ छूट रहे थे, ठीक तभी मालेक तांत्रिक द्वारा भेजे गए वे दो ताकतवर और नेक जिन्न प्रकट हुए।
जब उस काली परछाईं ने उस पर दोबारा हमला करना चाहा, तो पहले जिन्न ने अपना विशाल नूरानी हाथ बढ़ाकर उस अशुभ शक्ति को एक ठोस दीवार की तरह रोक दिया। हवा का रुख बदलकर उसने लड़के के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया, ताकि बाहर की कोई भी बाधा उसे अब न छू सके।
दूसरे जिन्न ने बड़े ही प्यार से लड़के के कान में फुसफुसाकर कुछ पवित्र शब्द उच्चारण किए। इससे पल भर में उसके शरीर की सारी थकान दूर हो गई और फेफड़ों में एक नई जान आ गई। उसे लगा जैसे उसकी बाहों में दस इंसानों की ताकत आ गई हो।
जिन्न की दी गई उस असीम ताकत के सहारे उसने आखिरी बार सांस रोकी और झपट पड़ा। ज़मीन की गहराई से उस ज़िद्दी सफेद शिमुल की जड़ें लोहे की ज़ंजीरों की तरह जकड़ी हुई थीं, लेकिन इस बार उसके एक ज़ोरदार झटके से ज़मीन फट गई और पेड़ ऊपर आ गया।
पेड़ हाथ में आते ही वह एक ही सांस में चिल्लाया नहीं, बल्कि शांति से उठ खड़ा हुआ। उसे नहीं पता था कि मालेक तांत्रिक उस पर नज़र रखे हुए हैं, लेकिन दूर खड़े वे दो अदृश्य पहरेदार हल्के से मुस्कुराए और हवा में गायब हो गए।
इसके बाद सात गाँवों के सात सफेद शिमुल (मंदार) पेड़ लेकर जब वह हांफता हुआ मालेक तांत्रिक के डेरे पर लौटा, तो तांत्रिक के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि भरी मुस्कान थी।
तांत्रिक ने उसकी तरफ टकटकी लगाकर देखा और गंभीर आवाज़ में कहा, "शाबाश बेटे! तूने कर दिखाया। लेकिन क्या तुझे पता है, एक वक्त जब तेरी सांस उखड़ने वाली थी, तब तू अकेला नहीं था?"
वह हैरान होकर तांत्रिक की तरफ देखने लगा। तांत्रिक ने मुस्कुराकर कहा, "तेरी ज़िद ने मुझे हैरान कर दिया, इसलिए तेरी जान बचाने के लिए मैंने अपने दो वफादार और ताकतवर नेक जिन्न भेजे थे। अगर वे नहीं होते, तो आज तेरी जान और मान—दोनों ही चले जाते।"
वह सुन्न होकर खड़ा रहा। तांत्रिक ने उसके कंधे पर हाथ रखा और फिर कहने लगे, "लेकिन बेटा, यह मत सोचना कि काम खत्म हो गया है। असली खेल तो अभी शुरू ही नहीं हुआ है! आने वाली पूर्णिमा की रात को हम फिर से रहीमा और नज़रुल को लेकर बैठेंगे। उस दिन सारी काली शक्तियां खौफ में रहती हैं।"
वह खौफनाक पूर्णिमा आ गई।
मालेक तांत्रिक उन सात सफेद शिमुल या मंदार के पेड़ों को हाथ में लेकर लड़के की तरफ देखकर अजीब तरह से मुस्कुराए। लेकिन तब समय बर्बाद करने की स्थिति नहीं थी। पूर्णिमा का चाँद आसमान के बीचों-बीच था।
बाहर हवा की चीख-पुकार और कमरे के अंदर नज़रुल और रहीमा की कराहें मिलकर एक नर्क जैसा माहौल बना रही थीं।
मालेक तांत्रिक गरज उठे—
"सब लोग कमरे से बाहर निकल जाओ! सिर्फ यह बहादुर लड़का और मैं अंदर रहेंगे। खबरदार, फज्र की अज़ान होने तक कमरे के दरवाज़े पर खटखटाना मत, चाहे कोई भी चीख क्यों न सुनाई दे!"
सब लोग डरते-डरते बाहर चले गए। तांत्रिक ने कमरे के बीच में एक बड़ा मिट्टी का मटका रखा। उसमें नदी का पानी भरकर सात गाँवों के उन सात मंदार पेड़ों की टहनियों को भिगो दिया। इसके बाद जेब से पुराने ज़माने की एक तांबे के रंग की अंगूठी और कुछ खास जड़ी-बूटियाँ निकालीं।
नज़रुल और रहीमा की हालत तब चरम पर थी—
अचानक नज़रुल ने बड़बड़ाना बंद कर दिया और एक भयानक चीख मारी। उसकी दोनों आँखें मजीद मिया की तरह बिल्कुल काली हो गई थीं। वह बिस्तर पर बैठकर झूलते हुए कहने लगा, "हमारा खाना वापस दो... वरना तुम्हारा कलेजा खा जाएंगे!"
रहीमा भी उसी सुर में एक अजीब सी भाषा में बात करने लगी जो आम इंसानों की समझ से बाहर थी।
मालेक तांत्रिक बिना घबराए उन सात मंदार की टहनियों को एक साथ मुट्ठी में लेकर नज़रुल और रहीमा के शरीर पर नदी का पानी छिड़कने लगे। उनके होठों पर लगातार मंत्र चल रहे थे। हर बार पानी छिड़कने पर नज़रुल और रहीमा दर्द से तड़प उठते थे। जैसे आग की लपटें उनके शरीर को जला रही हों।
तांत्रिक ने तब उस बहादुर लड़के को निर्देश दिया—
"इस मटके को पकड़! इसी मटके के अंदर सारी अशुभ शक्तियों को कैद करना होगा। जब मैं कहूँगा 'बंद कर', तब तू एक पल की भी देरी किए बिना मिट्टी के ढक्कन से इसका मुँह दबा देना!"
अचानक कमरे का दीया बुझ गया। घने अंधेरे के बीच सैकड़ों लोगों के भीगे हुए पैरों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। मानो पद्मा नदी के तल से वे भटकती हुई आत्माएँ अपने साथियों को ले जाने के लिए उठ आई हों। कमरे की दीवारें कांपने लगीं।
मालेक तांत्रिक ने अपनी लाठी से ज़मीन पर ज़ोरदार वार किया और चिल्लाए—
"तुम्हारा समय खत्म हो गया! जहाँ से आए हो, वहीं वापस लौट जाओ!"
कमरे के अंदर एक अदृश्य युद्ध का बिगुल बज उठा। नज़रुल और रहीमा के मुँह से धुएं जैसी कोई काली चीज़ बाहर निकलकर उस मिट्टी के मटके की तरफ खिंचने लगी। वे दोनों तब बेजान होकर फर्श पर गिर पड़े। मटका तब ज़ोरों से कांप रहा था, मानो अंदर कोई जानवर फंसा हुआ हो और छटपटा रहा हो।
तांत्रिक ने आवाज़ दी— "अभी! मुँह बंद कर!"
लड़के ने बिना वक्त गंवाए मिट्टी के ढक्कन से मटके का मुँह बंद कर दिया। मालेक तांत्रिक ने जल्दी से एक लाल कपड़े से मटके का मुँह बांध दिया और उस पर अपने खून से एक खास डिज़ाइन बना दिया।
कुछ ही पलों में बाहर का तूफान रुक गया। काश के फूलों की फुसफुसाहट अब नहीं थी। चारों तरफ की घुटन खत्म हो गई और एक पवित्र शांति छा गई।
तांत्रिक ने पसीने से भीगे शरीर के साथ राहत की सांस ली। आज कल्याणपुर चर बच गया था।
अगली सुबह गाँव के लोग खुशी से झूम उठे। रहीमा और नज़रुल पूरी तरह से स्वस्थ थे। गाँव के लोगों और बुज़ुर्गों ने मिलकर फैसला किया कि जिस लड़के की असीम बहादुरी से आज गाँव बचा है, उसे और उसकी माँ को ईनाम देंगे।
लेकिन… तभी एक चौंकाने वाली घटना घटी!
पूरे कल्याणपुर चर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया। लेकिन उस बहादुर लड़के या उसकी माँ का कोई नाम-ओ-निशान नहीं मिला!
तब गाँव वालों को अचानक होश आया— अरे, इस लड़के और इसकी माँ को तो पहले कभी इस गाँव में देखा ही नहीं गया था! उनका नाम भी तो किसी को नहीं पता था! यहाँ तक कि जिस रात कफीलुद्दीन तांत्रिक के सामने लड़के ने खुद से ज़िम्मेदारी ली थी, उससे पहले इस गाँव में उनके होने की भनक तक किसी को नहीं थी।
वे कौन थे? कहाँ से आए थे? और काम खत्म होते ही हवा में कहाँ गायब हो गए?
गाँव के बुज़ुर्गों ने आपस में बात करनी शुरू की, "शायद वे कोई आम इंसान नहीं थे। अल्लाह की असीम रहमत से, इस अभागे गाँव के लोगों की मदद करने के लिए ही शायद वे इंसानी रूप धरकर आए थे।"
सच क्या है, यह आज तक कोई नहीं जान पाया। उस माँ-बेटे की पहचान आज भी कल्याणपुर चर के लोगों के लिए एक अनसुलझा रहस्य बनी हुई है।
और वह मटका? मालेक तांत्रिक उसे बहुत दूर ले गए थे, नदी के बीचों-बीच… और एक ऐसी गहरी जगह में फेंक दिया था ताकि वह आसानी से किसी के जाल या हाथ में न पड़े।
आज का हॉरर वर्ल्ड यहीं खत्म होता है। सुना आपने? सावधान रहिएगा… अमावस्या की रात को पद्मा के किनारे मत जाइएगा। वे अभी भी पुकार सकते हैं…
अस्सलाम अलैकुम।